जिला कांगडा प्राकृतिक सम्पदाओं से भरपूर क्षेत्र है। यहां की पहाड़ी जलवायु स्वच्छ पर्यावरण और फूलों से लदी वनस्पतियाँ मधुमक्खियों के पालन के लिए बेहद अनुकूल साबित हो रही हंै। इसी कारण हाल के वर्षों में मधुमक्खी पालन न केवल किसानों के लिए अतिरिक्त आय का साधन बना है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा भी दे रहा है।
उद्यान विभाग के सौजन्य से जिला कांगडा में मधुमक्खी पालन (एपीकल्चर) ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुका है। शुद्वता और जैविक गुणवत्ता के लिए लिए प्रसिद्ध हिमाचली शहद की बढ़ती मांग ने यहां के किसानों की आय को नया आयाम दिया है। वर्तमान में जिला कांगडा में 42077 मौन वंश है। लगभग 1807 किसान मधुमक्खी पालन में संलग्न हैं और यहां वार्षिक शहद का दत्पादन लगभग 645 मीट्रिक टन है। 1971 में हिमाचल में 1250 मौन वंश थे जोकि 2001 में बढ़कर 8203 मौन वंश हो गए थे।

जिला कांगडा के इच्छी के मौन पालक सुरेन्द्र कुमार ने 700 बी-कलोनियाँ स्थापित की हैं। उन्होने बताया कि उनकी वार्षिक आय पिछले वर्ष लगभग 15 लाख रुपए के करीब रही। उन्होंने बताया कि शहद की बिक्री से उन्हें हर साल अच्छी आमदनी होती है। एक बक्से से औसतन 20 किलो शहद मिलता है। जो बाजार में ऊंचे दाम पर बिकता है।
इसी प्रकार नगरोटा बगवां के निहार गलु गांव के किसान लाल चन्द कहते हैं कि पहले खेती से गुजारा मुश्किल था, लेकिन अब उन्होंने बताया कि वर्तमान में उनके पास 350 बी-कलोनियाँ है जिसमें प्रति वर्ष लगभग 6 लाख की आमदनी प्राप्त कर रहे हैं।
मधुमक्खी पालन की एसएमएस (एपीकल्चर) उत्तरी क्षेत्र कांगड़ा डा. निशा मेहरा ने बताया कि मधुमक्खियों के माध्यम से फलों और अन्य फस्लों की पैदावार 15 से 22 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। जिसे आर्थिक दृष्टि से देखा जाऐ तो यह शहद से भी अधिक मूल्यवान है। उन्होने बताया कि कांगड़ा जिले में उद्यान विभाग (एपीकल्चर) में मधुमक्खी पालन की पांच से सात दिन का मौन पालन प्रशिक्षण कार्यशालाएं आयोजित करवाई जाती हैं, प्रशिक्षण के उपरान्त किसानों को बी-कलोनियाँ, बक्से व अन्य उपकरणों पर 80 प्रतिशत तक सब्सिडी उपलब्ध कराई जाती है।

उन्होने बताया कि कागंडा जिला में 4 डेमोंस्टेशन अपायरियाँ घुरकड़ी, जाच्छ, पठियार और चैतडू में हंै। जिससे लगभग 720 किलो शहद 240 मौन वंशों से प्रति वर्ष प्राप्त किया जाता है। उद्यान विभाग से 320 रूपए प्रति किलो (प्रोसैसड हनी) व 200 प्रतिकिलो (राॅ-हनी) के हिसाब से खरीदा जा सकता है। विभाग 8 रु प्रति किलो के हिसाब से शहद की प्रोसेसिंग की सुविधा भी देता है, यदि कोई मौन पालक अपना शहद प्रोसैस करवाना चाहता है तो विभाग को संपर्क कर सकता है।
उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री मधु विकास योजना के तहत मधुमक्खी पालन के लिए किसानों को अधिकतम 50 मधुमक्खी कालोनियों के छत्तों व उपकरणों पर 1.76 लाख की सहायता प्रदान की जाती है। इसके अलावा बी-फलौरा पर 3500 रुपये प्रति 2 बीघा और ऐपीस सिराना (देसी मधुमक्खी) पर 5000 रुपये सहायता प्रदान की जाती है।
उप निदेशक उद्यान विभाग जिला कांगडा डा. अलक्ष पठानीया ने बताया कि जिला में मधुमक्खी पालन अब केवल अतिरिक्त आमदनी का जरिया नही रह गया है, बल्कि कृषि उत्पादक्ता, ग्रामीण रोजगार और किसानों की आर्थिक मजबूती के लिए एक सशक्त माध्यम बन गया है।

यदि युवा इससे जुड़ी सरकारी योजनाओं व प्रशिक्षणों का सही लाभ लें, तो यह क्षेत्र आने वाले वर्षों में शहद उत्पादन हब बनने की दिशा में अग्रसर हो सकता है। उन्होंने कहा कि मधुमक्खी पालन हेतु कोई भी युवा उनके विभाग से इस सम्बन्ध में किसी भी जानकारी के लिए सम्पर्क कर सकता है तथा विभागीय योजनाओं का लाभ उठा सकता है।
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