भक्ति ज्ञान की पराकाष्ठा है और ज्ञान भक्ति की ही शुरुआत है, दोनों में विरोध नहीं है : अतुल कृष्ण महाराज


रक्कड़, 28 मई (पूजा ): परमात्मा के मार्ग पर जितनी बाधाएं हैं वे तो ज्ञान से काटी जा सकती है लेकिन जो सीढ़ियां हैं वे भक्ति से ही चढ़ी जाती हैं. इसलिए ज्ञान निषेधात्मक है, व्यर्थ को तोड़ने में बड़ा कारगर है परंतु सार्थक को जन्माने में नहीं. भक्ति विधायक है, ज्ञान निषेधात्मक है. ज्ञान ऐसा है जैसे कोई भूमि तैयार करे, घास-पात अलग करे, खाद डाले और भक्ति ऐसी है जैसे कोई बीज बोए. ज्ञान अपने में अधूरा है, उससे सफाई तो हो जाती है लेकिन बीज आरोपित नहीं होते. ज्ञान जरूरी है पर काफी नहीं है क्योंकि ज्ञान बुद्धि के लिए ठीक है पर हृदय के लिए भक्ति उत्तम है ।


       उक्त अमृतवचन श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस में परम श्रद्धेय अतुल कृष्ण जी महाराज ने नाग मंदिर, रक्कड़ में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि ज्ञान की बात करना इसलिए आवश्यक है ताकि हमारे भीतर अज्ञान की जो पर्त दर पर्त भीड़ लगी है, कट जाए. जब एक बार मन की भूमि साफ हो गई, व्यर्थ का कचरा न रहा तो फिर भक्ति के बीज बोए जा सकते हैं, फिर भज गोविंदम की संभावना है. भक्ति ज्ञान की पराकाष्ठा है और ज्ञान भक्ति की ही शुरुआत है, दोनों में विरोध नहीं है. मनुष्य के भीतर हृदय भी है और बुद्धि भी. दोनों को छूना होगा, दोनों का रूपांतरण होना चाहिए. अगर हम सिर्फ ज्ञान में ही उलझ गए तो कोरे रेगिस्तान की भांति हो जाएंगे. जैसे रेगिस्तान साफ सुथरा तो है पर वहां कुछ भी उगेगा नहीं. स्वच्छ है पर निर्बीज, विस्तृत है पर कोई ऊंचाई और कोई गहराई नहीं. ज्ञान शुष्क और अकेला है ।

  महाराजश्री ने कहा कि भक्ति हरियाली है. भक्त ऐसे है जैसे कोई अंधा हो, ज्ञान ऐसे है जैसे कोई लंगड़ा हो और दोनों मिल जाएं तो परम संयोग घटित होता है. जब हम ज्ञान को भक्ति का सहारा बनाते हैं और भक्ति को ज्ञान का सहारा बनाते हैं तो दोनों जुड़कर हमारे पंख बन जाते हैं जो आकाश की ऊंचाइयों को छू लेते हैं. न एक पंख से कभी कोई पक्षी उड़ा है, न एक पैर से कोई प्राणी चला है, न एक पतवार से नाव चलती है, दोनों पतवार चाहिए. भक्ति और ज्ञान का महासमन्वय होने पर हमारे अंतःकरण में परमात्मा का अलौकिक प्रेम जागृत हो जाता है. आज कथा में ध्रुव जी का चरित्र, भक्ति की महिमा, राजा प्रियव्रत की कथा एवं जड़ भरत जी का प्रसंग सभी ने प्रसन्न मन से श्रवण किया ।

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